कितना मजबूर होगा वह पिता जो अपने 7 लोगों के परिवार को भूख से बचाने के लिए 4 साल की बच्ची का करने चला सौदा,पढ़े खबर

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आज के समय में कितने अजीबोगरीब मामले सामने आते रहते हैं लेकिन इस बार एक ऐसा मामला सामने आ रहा है जहां पर एक 7 लोगों के परिवार को भूख से बचाने के लिए पिता ने अपने 4 साल की बेटी को बेचने का फैसला किय बता दें कि सोचने वाली बात है वह पिता कितना लाचार होगा जो अपने परिवार को भूख से बचाने के लिए अपनी 4 साल की बेटी को बेचने का सौदा कर रहा था।इस अफगान पिता की बेबसी का खुलासा मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में किया है। यह रिपोर्ट ‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ ने भी पब्लिश की है। बाप का नाम है मीर नाजिर। नाजिर 15 अगस्त के पहले तक अफगान पुलिस में छोटे कर्मचारी थे। तालिबान मुल्क पर काबिज हुए तो नौकरी चली गई। जो बचत थी, वो खत्म हो गई। घर भी किराए का है। परिवार में कुल सात लोग हैं। अब इनका पेट कैसे भरें?लंदन टाइम्स के रिपोर्टर एंथनी लॉयड से मीर ने कहा- सात लोगों का परिवार है। सबसे छोटी बेटी का नाम साफिया है। उसकी उम्र चार साल है। तालिबान आए तो मेरी पुलिस की नौकरी चली गई। अब परिवार का पेट कैसे पालूं, खाना कहां से लाऊं? मुल्क की इकोनॉमी भी तो तबाह हो चुकी है। कहीं से कोई उम्मीद नहीं है। बेटी को बेचने से बेहतर होता कि मैं खुद मर जाता। लेकिन, क्या मेरी मौत के बाद भी परिवार बच जाता? उन्हें कौन रोटी देता? यह बेबसी में लिया गया फैसला है।नम आंखों की ज्यादतियों को रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए मीर आगे कहते हैं- एक दुकानदार मिला। उसे बाप बनने का सुख नहीं मिला। उसने मुझे ऑफर दिया कि वो मेरी साफिया को खरीदना चाहता है। वो उसकी दुकान पर काम भी करेगी। हो सकता है, भविष्य में उसकी तकदीर संवर जाए।

मैं तो अब पुलिसकर्मी से हम्माल और मजदूर बन गया हूं। वो दुकानदार मेरी बेटी को 20 हजार अफगानीस (इंडियन करंसी के हिसाब से करीब 17 हजार रुपए) में खरीदना चाहता है। इतनी कम कीमत पर बेटी को बेचकर क्या करूंगा? मैंने उससे 50 हजार अफगानीस (भारतीय मुद्रा में करीब 43 हजार रुपए) मांगे हैं।नाजिर इस कहानी को आगे बढ़ाते हैं। कहते हैं- साफिया पर उस दुकानदार से मेरी बातचीत चल रही है। मैं उसे क्या दे पाउंगा? हो सकता है इस पैसे से मैं पूरे परिवार को बचा लूं। उस दुकानदार ने मुझसे वादा किया है कि अगर मैंने भविष्य में उसके पैसे लौटा दिए तो वो मुझे मेरा लख्त-ए-जिगर (कलेजे का टुकड़ा) लौटा देगा। खुशी है कि मुल्क में अब जंग थम गई है, लेकिन गरीबी और भुखमरी नया दुश्मन है।बात को मंजिल तक पहुंचाते हुए नाजिर निढाल हो जाते हैं। कुछ रुककर कहते हैं- मैं भी आप जैसा ही हूं। ये मत समझिए कि मैं अपनी साफिया से प्यार नहीं करता। लेकिन, मजबूर हूं और कोई विकल्प भी तो नहीं।

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