सास ससुर की प्रॉपर्टी पर बहु का अधिकार है या नहीं ? हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
Property Rule : बेटे को घर से बेदखल करने के बाद सास ससुर की प्रॉपर्टी में क्या बहु का कोई अधिकार है या नहीं इसको लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है जो बाकी मामलों अलग हो सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट में एक बुजुर्ग महिला की ओर से याचिका दायर की गई थी। कोर्ट में बताया गया कि जिस घर में उनका बेटा और बहू रह रहे थे, वह उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदा है।
घरेलू कलह की वजह से बहू बेटा घर छोड़कर चले गए थे। फिर कुछ साल बाद वापस आ गए। इसके बाद मां ने बेटे के साथ किराए के समझौते के माध्यम से लाइसेंस की व्यवस्था की थी। जिसके तहत उन्हें प्रतिमाह ₹3000 का भुगतान करना था। लेकिन बेटे ने किराया नहीं दिया। इसके बाद मां ने बेटे को संपत्ति से बेदखल कर दिया था। बेटे के घर से जाने के बाद बहू ने उस घर को खाली करने से साफ इंकार कर दिया। Property Rule
बहू ने तर्क दिया कि यह उसका मैट्रिमोनियल होम यानी वैवाहिक घर है और उसे वहां रहने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने इस मामले में साफ किया कि अगर बेटे को घर से जाने के लिए कह दिया गया है तो बहू को भी सास की सेल्फ एक्वायर्ड प्रॉपर्टी यानी खुद की कमाई से खरीदे गए घर में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। बहू के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि मामले की परिस्थितियों में संपत्ति साझा घर की श्रेणी में नहीं आता।
इस मामले में आदेश पारित करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा पति को दिया गया लाइसेंस पहले ही समाप्त हो चुका है। इसीलिए बहू संपत्ति में किसी भी स्वतंत्र अधिकार, स्वामित्व या हित का दावा नहीं कर सकती। Property Rule
घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005 के तहत पत्नी को मिलने वाली सुरक्षा ऐसे मामलों में पति के खिलाफ लागू होती है ना कि सास के खिलाफ। उसके अधिकार और दायित्व किराएदार से अधिक या बड़े नहीं होंगे। यहां क्योंकि पति का लाइसेंस ही समाप्त हो चुका है। इसीलिए अपीलकर्ता को कोई बेहतर सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती। Property Rule
यह कहते हुए कोर्ट ने बहू की दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया। कानून को स्पष्ट करते हुए इस मामले में कोर्ट ने तीन महत्वपूर्ण बातें कही। सबसे पहला सेल्फ एक्वायर्ड प्रॉपर्टी पर सिर्फ मालिक का हक। कोर्ट ने कहा कि अगर संपत्ति सास की कमाई से खरीदी गई है तो उस पर पहला और आखिरी हक उन्हीं का है। दूसरा बेटे का हक नहीं तो बहू का भी नहीं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जब बेटे को ही उस घर में रहने की अनुमति नहीं है और उसे बाहर कर दिया गया है तो बहू अपने पति के जरिए उस घर में रहने का दावा नहीं ठोक सकती। तीसरा बुजुर्गों की शांति का अधिकार। Property Rule
कोर्ट ने माना कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में शांति से जीने का हक है। ऐसे में उन्हें उनके ही घर में प्रताड़ित या परेशान नहीं किया जा सकता। आपको बता दें यह पूरा मामला साल 2003 से जुड़ा है। तब बहू बेटी की शादी हुई और इसके बाद पारिवारिक मतभेदों के कारण बहू और बेटी सास के घर से चले गए। लेकिन साल 2014 में वापस रहने के लिए उसी घर में आ गए। इसके बाद बुजुर्ग महिला ने किराए के एक समझौते के माध्यम से लाइसेंस व्यवस्था की। इस लाइसेंस व्यवस्था के तहत बेटे को हर महीने ₹3000 का भुगतान करना था।
बेटे द्वारा कथित तौर पर किराया ना चुकाने के बाद बुजुर्ग महिला ने औपचारिक रूप से उन्हें बेदखल कर दिया और 2017 में संपत्ति पर उसके कब्जे का अधिकार समाप्त कर दिया। हालांकि बहू और बच्चा वहीं रहते रहे। बाद में बुजुर्ग महिला ने बहू और बेटे को संपत्ति में किसी भी प्रकार का तृतीय पक्ष अधिकार बनाने से रोकने के लिए स्थाई निषेधाज्ञा हेतु एक दीवानी मुकदमा दायर किया। साल 2019 में उनके पक्ष में एक डिग्री पारित की गई। लेकिन इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए बहू ने तर्क दिया कि भले ही संपत्ति उनकी सास की है उस पर सास का स्वामित्व हो लेकिन वैवाहिक घर में उन्हें रहने का अधिकार है। Property Rule
गौरतलब है अक्सर ऐसे मामलों में डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट के तहत शेयर्ड हाउसहोल्ड यानी साझे घर का हवाला दिया जाता है। लेकिन इस फैसले ने साफ कर दिया कि साझा घर होने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि आप मकान के असली मालिक की मर्जी के खिलाफ हमेशा के लिए वहां कब्जा कर लें। कोर्ट ने स्पष्ट किया। बहू के रहने की व्यवस्था या गुजारा भत्ता जिसे मेंटेनेंस कहा जाता है। इसकी जिम्मेदारी उसके पति की है ना कि बुजुर्ग साससुर की।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी को रहने के लिए पति एक अलग जगह दे। लेकिन वह अपनी मां को उनका घर खाली करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा अगर बेटे को घर छोड़ने के लिए कहा जाता है तो बहू को सास की खुद की कमाई से खरीदी गई सेल्फ एक्वायर्ड प्रॉपर्टी में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। Property Rule
गौरतलब है दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन तमाम बुजुर्ग माता-पिता के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है जो बुढ़ापे में अपने बहू बेटे या किसी संतान के आपसी झगड़ों की वजह से अपने ही घर में बेगाने हो जाते हैं। कोर्ट का संदेश साफ था। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के नाम पर बुजुर्गों के अधिकारों और उनकी संपत्ति की अनदेखी नहीं की जा सकती।
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