शक की सुई कट्टा घोटाले की ओर,हलद्वानी के आरएफसी गोदाम में मिली खराब चीनी से उठे सवाल

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हलद्वानी एसकेटी डॉटकॉम

बाजपुर के सहकारी चीनी मिल से हल्द्वानी आरएफसी के गोदाम को भेजी गई 88 कुंतल चीनी के खराब पाए जाने के बाद अब यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि अगर यह चीनी बाजपुर चीनी मिल से नहीं आई है तो बाजपुर के पट्टों में कैसे और कहां से भरी गई होगी।

तेजतर्रार पीसीएस अधिकारी एवं संभागीय खाद्य नियंत्रक ललित मोहन रयाल ने जब इस पूरे मामले की जांच के लिए हल्द्वानी से अधिकारियों की एक टीम भेजी तो टीम की भी आंखें खुली की खुली रह गई।

यह मामला तब खुला जब हलद्वानी सिथित आरएफसी गोदाम से चीनी उठाने के दौरान एक कोटेदार ने काली एवम खरब चीनी को लेने से इनकार कर दिया।

आरएफसी द्वारा भेजी गई जांच अधिकारियों की टीम ने ने बाजपुर चीनी मिल के अधिकारियों के साथ एक संयुक्त जांच रिपोर्ट में कहा कि बाजपुर चीनी मिल के गोदाम संख्या 4 वर्ष 16 में रखी गई गुणवत्ता पूर्वक है कथा बाजपुर चीनी मिल के कट्टों में भी अंतर पाया गया है अब इस जांच के बाद शक के दायरे में आए इन 176 कट्टों( जिन में 88 कुंतल चीनी होती है ) में खराब चीनी कहां से बनवाई गई और बाजपुर चीनी मिल के कट्टों को टैग का इस्तेमाल सर इसे कैसे हल्द्वानी के आरएफसी गोदाम में भिजवाया गया। बाजपुर चीनी मिल के प्रधान प्रबंधक प्रकाश चंद्र ने कहा कि मिलते जब चीनी का लदान होता है तो वहां पर खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता विभाग का अधिकारी मौजूद रहता है अधिकारी के चेक करने के बाद ही चीनी उठाई जाती है गोदाम से बाहर जाने के बाद चीनी की गुणवत्ता की जिम्मेदारी मिलती नहीं होती है और इसके अलावा चीनी को ले जाने वाले वाहनों से भी मिल का कोई संबंध नहीं होता है।

यह घोटाला कितना ही शातिर दिमाग से किया गया हो लेकिन संभागीय खाद्य नियंत्रक तक यह मामला पहुंचने के बाद यह घोटाले में संलिप्त लोगो का बच पाना मुश्किल है।। बाजपुर चीनी मिल के कट्टे एवम टैग हासिल कर अब चीनी को इस तरह से सार्वजनिक वितरण प्रणाली मैं खफा देना अब आसान नहीं होगा। इससे पहले भी चावल घोटाले में कई अधिकारियों के ऊपर गाज गिरी थी।

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