हल्द्वानी रेलवे जमीन विवाद: 11 स्कूल, 10 मस्जिद और 50000 लोग…, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले शहर छावनी में तब्दील

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एसएसपी मंजुनाथ टीसी ने बताया कि राज्य पुलिस मुख्यालय और कुमाऊं रेंज ने अतिरिक्त बल उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने कहा, “सामान्य अलर्ट जारी कर दिया गया है और विशेष पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।” बनभूलपुरा में भारी पुलिस बल और पीएसी को तैनात किया गया है।

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हल्द्वानी रेलवे जमीन विवाद। (इमेज सोर्स-फाइल फोटो)

Haldwani News: रेलवे जमीन विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। इससे पहले उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके को हाई-सिक्योरिटी जोन में बदल दिया जाएगा। इसके लिए बड़ी संख्या में पुलिस तैनात की जाएगी और दूसरी जगहों से अतिरिक्त बल बुलाए जाएंगे। साथ ही, इलाके को सेक्टर, जोन और सुपर जोन में बांटा जाएगा।

एसएसपी मंजुनाथ टीसी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि राज्य पुलिस मुख्यालय और कुमाऊं रेंज ने अतिरिक्त बल उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने कहा, “सामान्य अलर्ट जारी कर दिया गया है और विशेष पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।” बनभूलपुरा में भारी पुलिस बल और पीएसी को तैनात किया गया है।

एलआईयू को भी तैनात किया जाएगा

मंजुनाथ ने बताया कि पुलिस टीयर गैस स्क्वाड, एंटी-राइट स्क्वाड और हथियारबंद यूनिट के साथ-साथ ड्रोन निगरानी टीमें भी तैनात कर रही है। फायर डिपार्टमेंट, ट्रैफिक पुलिस और अन्य विशेष टीमों के जवान भी तैनात किए जाएंगे। पुलिस यूनिट के बीच बातचीत बनाए रखने के लिए वायरलेस टीमों के साथ-साथ लोकल इंटेलिजेंस यूनिट को भी तैनात किया जाएगा। उन्होंने कहा कि तैनात किए जाने वाले कर्मियों की सही संख्या पुलिस बाद में बताएगी।

क्या है पूरा मामला?

अब मामले की बात की जाए तो यह हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास की जमीन से संबंधित है। इसमें गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर क्षेत्र शामिल है। रेलवे विवादित जमीन पर अपना मालिकाना हक जताता है और कहता है कि वहां बिना इजाजत के निर्माण किए गए हैं। 2016-17 में रेलवे और जिला प्रशासन के संयुक्त सर्वे में 4365 निर्माणों की पहचान अतिक्रमण के तौर पर की गई थी।

इस बस्ती के बड़े आकार की वजह से यह मामला काफी संवेदनशील हो गया है। सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, विवादित इलाके में 50000 से ज्यादा लोग रहते हैं। यह इलाका सिर्फ घरों तक ही सीमित नहीं है। यहां तीन सरकारी स्कूल, 11 मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल, 10 मस्जिदें, 12 मदरसे, राज्य सरकार का एक पब्लिक हेल्थ सेंटर और एक मंदिर भी है।

इस विवाद की शुरुआत उत्तराखंड हाई कोर्ट में हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के पास बहने वाली गौला नदी में अवैध रेत खनन से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान हुई थी। बाद में रेलवे की जमीन पर कथित कब्जे का मुद्दा भी इस कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन गया।

दिसंबर 2022 में हाई कोर्ट ने लोगों को एक हफ्ते के अंदर विवादित जमीन खाली करने का निर्देश दिया और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग की भी इजाजत दी। इस आदेश के कारण हल्द्वानी में विरोध प्रदर्शन हुए और लोगों को अपना घर खोने का डर सता रहा था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली आदेश पर रोक लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने 50000 लोगों के विस्थापति होने पर चिंता जाहिर की

कोर्ट ने लगभग 50000 लोगों के विस्थापित होने की संभावना पर चिंता जताई और कहा कि किसी भी व्यावहारिक व्यवस्था में रेलवे की जरूरतों और प्रभावित लोगों के पुनर्वास, दोनों का ध्यान रखना होगा।

रेलवे ने अपने दावे के समर्थन में 1959 की अधिसूचना, 1971 के राजस्व रिकॉर्ड और 2016-17 के संयुक्त सर्वेक्षण के नतीजों का हवाला दिया है। वहीं, गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर के लोगों का कहना है कि उनके परिवार दशकों से, कुछ मामलों में तो पीढ़ियों से, इस क्षेत्र में रह रहे हैं। उन्होंने अपने दावे को पुष्ट करने के लिए कब्जे और संपत्ति संबंधी लेन-देन के दस्तावेजों का सहारा लिया है।

क्या है विवाद का मुख्य बिंदु?

विवाद का एक मुख्य बिंदु 1907 का सरकारी रिकॉर्ड है। लोगों ने इसी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि यह जमीन नजूल जमीन थी। यानी ऐसी सरकारी जमीन जिसे ऐतिहासिक रूप से कुछ खास शर्तों के तहत निजी इस्तेमाल या बसावट के लिए उपलब्ध कराया गया था। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस दस्तावेज के बारे में लोगों की व्याख्या को नहीं माना और कहा कि इससे उनके द्वारा दावा की गई कानूनी स्थिति साबित नहीं होती।

रेलवे ने कहा है कि हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए जमीन की जरूरत है। इसकी जरूरतों में अतिरिक्त रेलवे लाइनें और प्लेटफॉर्म, कोच की सफाई और सर्विसिंग के लिए वॉशिंग पिट, मरम्मत की जरूरत वाले कोच के लिए सिक लाइन शेड और ऐसी स्टेबलिंग लाइनें शामिल हैं जहां रेलवे कोच को तब खड़ा किया जा सके जब वे सर्विस में न हों।

रेलवे ने गौला नदी के निकट रेलवे बुनियादी ढांचे की असुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे रेलवे के कामों के लिए असल में जरूरी जमीन की पहचान करें, प्रभावित होने वाले परिवारों का पता लगाएं और पुनर्वास की योजना तैयार करें।

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यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने पारित किया था आदेश

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक अहम आदेश पारित किया। इसमें कहा गया कि कब्जा करने वाले लोग विवादित रेलवे जमीन पर अनिश्चित काल तक रहने के कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकते। साथ ही, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पुनर्वास के लिए प्रभावित परिवारों का आकलन करें और आवेदन की प्रक्रिया में मदद करें। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…

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