42 साल बाद सोने की कीमतों में सबसे बड़ी गिरावट: ईरान-इजरायल युद्ध के बीच आखिर क्यों ‘धड़ाम’ हुआ गोल्ड?
दुनियाभर के बाजारों में इस वक्त हलचल तेज है, लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर बुलियन मार्केट यानी सोने-चांदी के बाजार से आ रही है। आमतौर पर माना जाता है कि जब भी किन्हीं दो देशों के बीच युद्ध छिड़ता है या जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ता है, तो निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए सोने की तरफ भागते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय हमने यह देखा भी था। लेकिन इस बार ईरान और इजरायल के बीच चल रही जंग ने अर्थशास्त्र के सारे पुराने सिद्धांतों को पलट कर रख दिया है।
ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध का आज 22वां दिन है। 28 फरवरी से शुरू हुई इस जंग ने न केवल विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई है, बल्कि सोने और चांदी की कीमतों को भी अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत गिरकर 4500 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गई है। बताया जा रहा है कि 1983 के बाद यह एक हफ्ते में आने वाली सबसे बड़ी गिरावट है।
युद्ध के बीच क्यों फेल हुई ‘सेफ हेवन’ वाली थ्योरी?
बाजार के जानकारों के लिए भी यह स्थिति किसी पहेली से कम नहीं है। दरअसल, पारंपरिक रूप से युद्ध के समय सोने को ‘सेफ हेवन’ (सुरक्षित निवेश) माना जाता है और इसकी कीमतों में उछाल आता है। लेकिन इस बार ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से ही सोना और चांदी लगातार नीचे की ओर गोता लगा रहे हैं। शनिवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में आई इस बड़ी गिरावट ने दुनिया भर के निवेशकों को सकते में डाल दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों के बीच छाई घबराहट और वैश्विक स्तर पर नकदी की जरूरत के कारण लोग सोने को ‘होल्ड’ करने के बजाय बेच रहे हैं। यही वजह है कि सोने की कीमतों में गिरावट का यह रुख थमने का नाम नहीं ले रहा है।
चांदी की चमक भी पड़ी फीकी, निवेशकों के डूबे पैसे
सोने के साथ-साथ चांदी का हाल भी बुरा है। चांदी भी इस जंग के असर से खुद को बचा नहीं पाई और देखते ही देखते यह धड़ाम हो गई। महज एक दिन के भीतर चांदी की कीमतों में करीब 5% की गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह 70 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गई है। आपको बता दें कि इसी साल जनवरी में चांदी 119 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी, लेकिन अब इसकी चमक पूरी तरह फीकी पड़ती दिख रही है।
बाजार की इस उठा-पटक के बीच वे लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं, जिन्होंने पिछले एक साल की तेजी को देखकर सोने में भारी निवेश किया था। जनवरी में जब सोना और चांदी अपने रिकॉर्ड स्तर पर थे, तब कई छोटे निवेशकों ने ‘गोल्ड रैली’ में शामिल होने के लिए खरीदारी की थी। अब कीमतों में आई इस भारी गिरावट ने उनके पोर्टफोलियो को लाल निशान में डाल दिया है।
क्या अब ‘सब्र का बांध’ टूट रहा है?
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निवेशकों के बीच बेचैनी का आलम यह है कि जो लोग शॉर्ट टर्म के लिए बाजार में आए थे, वे अब निकलने की राह खोज रहे हैं। मसलन, राहुल जैसे कई छोटे निवेशक जिन्होंने इस उम्मीद में पैसा लगाया था कि युद्ध के दौरान कीमतें बढ़ेंगी, अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। उन्हें अब इस बात का इंतजार है कि आखिर सोने और चांदी में सुधार कब आएगा। वहीं, कुछ अनुभवी निवेशक जिन्होंने काफी पहले कम दाम पर सोना खरीदा था, वे भी अब मुनाफे के घटने से चिंतित हैं और बाजार के वापस ऊपर जाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
असल में, मौजूदा हालात ने सोने को लेकर निवेशकों के भरोसे को हिला दिया है। अगर गिरावट का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले दिनों में बुलियन मार्केट में बड़ी तब्दीली देखने को मिल सकती है। फिलहाल, एक्सपर्ट्स की राय बंटी हुई है और वे निवेशकों को जल्दबाजी में कोई भी बड़ा फैसला न लेने की सलाह दे रहे हैं।
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