पेंशनर्स और केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर, 15 जून के बाद अब इस बड़े फैसले पर टिकी हैं सबकी नजरें
देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए एक बड़ी और बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। आठवां केंद्रीय वेतन आयोग (8th Pay Commission) इस समय राज्य सरकारों के साथ अपनी बातचीत के आखिरी दौर में पहुंच चुका है। लेकिन, केंद्र और राज्यों के खजाने पर पड़ने वाले भारी-भरकम वित्तीय बोझ को देखते हुए, ऐसी खबरें आ रही हैं कि आयोग ‘फिटमेंट फैक्टर’ (Fitment Factor) के मामले में बेहद सावधानी और फूंक-फूंक कर कदम उठा सकता है।
हालांकि, वेतन आयोग ने अभी तक अपनी अंतिम सिफारिशें पूरी तरह फाइनल नहीं की हैं, लेकिन शुरुआती अंदरूनी चर्चाओं से जो संकेत मिल रहे हैं, वो कर्मचारियों की चिंता बढ़ा सकते हैं। बताया जा रहा है कि नया फिटमेंट फैक्टर 7वें वेतन आयोग द्वारा तय किए गए 2.57 मल्टीप्लायर के आसपास ही रह सकता है, जबकि कर्मचारी यूनियनें इसे काफी ज्यादा बढ़ाने की लगातार मांग कर रही हैं। आपको बता दें कि फिटमेंट फैक्टर ही वह मुख्य फॉर्मूला है, जो मौजूदा बेसिक पे और पेंशन को गुणा करके नया वेतन स्तर तय करता है। इसे सैलरी रिविजन प्रोसेस का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है।
खजाने पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का हो रहा है कड़ा आकलन
इस पूरे मामले और चर्चाओं की अंदरूनी जानकारी रखने वाले एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने ईटी (ET) की रिपोर्ट में बताया कि अब पूरी प्रक्रिया संभावित फिटमेंट फैक्टर की रेंज तय करने, राज्य सरकारों के साथ अंतिम दौर की बातचीत करने और संशोधित वेतन व पेंशन ढांचे से राजकोष पर पड़ने वाले वित्तीय असर के आकलन पर पूरी तरह केंद्रित हो रही है। केंद्र और राज्य सरकारों पर पड़ने वाले इस वित्तीय बोझ का सटीक आकलन ही अंतिम सैलरी ढांचा तय करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाएगा।
दूसरी तरफ, सरकारी कर्मचारियों की यूनियनों ने अपनी औपचारिक मांगों में भारी बढ़ोतरी की वकालत की है। कर्मचारियों की मांग है कि इस बार 3.83 का मल्टीप्लायर लागू किया जाना चाहिए और न्यूनतम बेसिक सैलरी को बढ़ाकर सीधे 69,000 रुपए प्रति माह किया जाना चाहिए।
यूपी, बंगाल से लेकर जम्मू-कश्मीर तक हो चुकी हैं अहम बैठकें
वेतन आयोग को अपनी मांगें और मेमोरेंडम सौंपने की आधिकारिक प्रक्रिया बीती 15 जून को पूरी तरह खत्म हो गई है। इसके साथ ही कर्मचारी यूनियनों, पेंशनर्स एसोसिएशंस और अन्य सभी स्टेकहोल्डर्स की तरफ से औपचारिक मांगों का दौर पूरा हो चुका है। अब आयोग इन सभी मांगों की गहराई से समीक्षा करेगा और साथ ही उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसी बड़ी राज्य सरकारों से मिले फीडबैक और इनपुट का अध्ययन करेगा।
इससे पहले आयोग की टीम दिल्ली, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, महाराष्ट्र और अन्य प्रमुख क्षेत्रों का दौरा कर वहां के स्टेकहोल्डर्स के साथ कई दौर की महत्वपूर्ण बैठकें पूरी कर चुकी है। बाकी बची हुई राज्य सरकारों से बातचीत पूरी होने के बाद, उम्मीद जताई जा रही है कि पैनल अपनी अंतिम रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले सभी जानकारियों को एक साथ समेकित करेगा।
7वें वेतन आयोग में क्या हुआ था?
वेतन आयोग की यह आने वाली रिपोर्ट ही तय करेगी कि केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए नया संशोधित वेतन और पेंशन ढांचा कैसा होगा। अगर हम पिछले यानी 7वें वेतन आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें, तो उस समय सरकार ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया था। इस फॉर्मूले की वजह से कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक पे 7,000 रुपए से बढ़कर सीधे 17,990 रुपए हो गई थी। हालांकि, इस बढ़ोतरी के कारण केंद्र सरकार का राजस्व खर्च साल 2015-16 के 4.8 फीसदी से बढ़कर साल 2016-17 में सीधे 9.9 फीसदी पर पहुंच गया था। यही वजह है कि इस बार सरकार और आयोग वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए फिटमेंट फैक्टर पर बेहद सतर्क रुख अपना रहे हैं
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