सुप्रीम कोर्ट की शराबबंदी पर कड़ी टिप्पणी: नुकसान के पांच प्रमुख पहलू
सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए पांच प्रमुख दुष्प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। अदालत ने गुजरात में जहरीली शराब से हुई मौतों का उल्लेख करते हुए बताया कि पूर्ण प्रतिबंध से समाज को अधिक नुकसान होता है। इसके अलावा, अदालत ने महाराष्ट्र के पॉइजन रूल्स को रद्द करते हुए सरकार की दलीलों को खारिज किया। जानें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पूरी राय।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
नई दिल्ली: शराबबंदी की प्रभावशीलता और इसके परिणामों पर गंभीर सवाल उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से समाज और व्यवस्था को पांच बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं। इसके साथ ही, पीठ ने गुजरात और अन्य राज्यों में जहरीली शराब से हुई मौतों और त्रासदियों का उल्लेख करते हुए सरकारों को सच्चाई का सामना करने के लिए कहा।
शराबबंदी के दुष्प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने गिनाए शराबबंदी के पांच बड़े दुष्प्रभाव
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने शराबबंदी के दुष्परिणामों को उजागर किया। अदालत ने कहा कि प्रतिबंध से सरकार को भारी राजस्व का नुकसान होता है, और इसे लागू करने में सरकारी खजाने से बड़ी राशि खर्च होती है। इसके अलावा, अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलने से पुलिस और प्रशासन में भ्रष्टाचार बढ़ता है। वैध शराब की कमी के कारण बाजार में नकली और जहरीली शराब का कारोबार बढ़ता है, जिससे लोग अन्य जानलेवा नशों की ओर आकर्षित होते हैं।
गुजरात का उदाहरण
गुजरात का उदाहरण: पाबंदी के बावजूद 600 से अधिक मौतें
अदालत ने कहा कि इतिहास बताता है कि पूर्ण शराबबंदी अक्सर शराब के कारोबार को भूमिगत कर देती है, जिससे जानलेवा शराब का चलन बढ़ता है। पीठ ने गुजरात का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि सख्त शराबबंदी के बावजूद राज्य में आजादी के बाद से 10 से अधिक बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हो चुकी हैं, जिनमें 600 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हाल ही में गुजरात के भावनगर में 13 और मध्य प्रदेश के सागर में 15 लोगों की जहरीली शराब से हुई मौतों को सिस्टम के लिए खतरे की घंटी करार दिया गया।
महाराष्ट्र के नियमों का रद्द होना
महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18A और 18B रद्द
इंडियन केमिकल काउंसिल और विभिन्न रसायन निर्माता कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18A और 18B को पूरी तरह रद्द कर दिया। ये नियम 1991 के मुंबई जहरीली शराब कांड के बाद बनाए गए थे, जिनके तहत मेथनॉल की बिक्री में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल अच्छी मंशा होना नियमों की मनमानी को सही नहीं ठहरा सकता। सरकार यह साबित करने में असफल रही कि ऐसे एडिटिव्स मिलाने से जहरीली शराब से होने वाली मौतों को कैसे रोका जा सकता है।
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