‘साहब, मैं मर चुका हूं! मेरा वोट काट दीजिए…’, वोटर लिस्ट का ऐसा झोल, चुनाव आयोग भी हैरान

खबरें तो आपने बहुत सुनी होंगी, राजनीति में धांधली की, वोट कटने की या चुनाव में फर्जी वोटिंग की। लेकिन कर्नाटक से वोटर लिस्ट को लेकर एक ऐसी अतरंगी और अजीबोगरीब खबर सामने आई है, जिसे सुनकर आप अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे और साथ ही सरकारी सिस्टम के ढर्रे पर माथा भी पीट लेंगे।
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वोटर लिस्ट का ऐसा झोल, चुनाव आयोग भी हैरान
दरअसल हालिया चुनावी डेटा और रिपोर्टों के विश्लेषण में एक बहुत ही चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। कर्नाटक में कम से कम 37 ऐसे जीवित नागरिक मिले हैं जिन्होंने आधिकारिक ‘फॉर्म 7’ भरकर खुद को ही मृत घोषित कर दिया है। जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। इन लोगों ने बाकायदा चुनाव आयोग के पास अर्जी भेजी है कि “मैं मर चुका हूं, इसलिए वोटर लिस्ट से मेरा नाम हटा दिया जाए।” लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
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‘साहब, मैं मर चुका हूं! मेरा वोट काट दीजिए…’,
इससे भी ज्यादा मजेदार और पहेली जैसा वाकया 334 जोड़ियों (यानी 668 लोगों) के साथ हुआ है। इन जोड़ियों ने एक-दूसरे को ही कागज पर मार डाला है। यानी रमेश ने फॉर्म भरकर कहा कि सुरेश मर गया है, और ठीक उसी दिन सुरेश ने भी फॉर्म 7 भरकर चुनाव आयोग से कह दिया कि रमेश अब इस दुनिया में नहीं रहा! अब सवाल यह उठता है कि अगर दोनों एक-दूसरे को मरा हुआ बता रहे हैं, तो फिर ये फॉर्म भर कौन रहा है? भूत या सरकारी सॉफ्टवेयर का कोई जादुई करिश्मा?
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क्या है यह पूरा मामला और ‘फॉर्म 7’ का चक्कर?
जब भी किसी राज्य में वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) का पुनरीक्षण होता है, तो चुनाव आयोग लोगों को नाम जोड़ने, सुधारने या हटाने की सुविधा देता है। फॉर्म 7 क्या होता है? इस फॉर्म का इस्तेमाल मुख्य रूप से मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए किया जाता है। आमतौर पर यह तब भरा जाता है जब किसी नागरिक की मृत्यु हो चुकी हो, या वह स्थायी रूप से किसी अन्य जगह शिफ्ट हो गया हो, या उसका नाम दो जगहों पर दर्ज हो।
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लेकिन हुआ क्या?
डेटा विश्लेषण से पता चला कि 37 मामलों में फॉर्म 7 भरने वाले व्यक्ति (Objector) का नाम और जिस व्यक्ति का नाम लिस्ट से काटना था, दोनों बिल्कुल एक ही थे! यहां तक कि उनके नाम के शुरुआती अक्षर भी वही थे। यानी इंसान खुद ही अर्जी दे रहा है कि “मुझे मृत घोषित कर दिया जाए।”
जब दो लोगों ने एक-दूसरे को घोषित कर दिया “मृत”!
इस पूरी घटना का सबसे अजीब पहलू वह 334 जोड़ियां हैं, जिन्होंने एक-दूसरे को मृत बताकर फॉर्म भरा। डेटा के मुताबिक:
ये सभी जोड़ियाँ एक ही पोलिंग स्टेशन (मतदान केंद्र) की मतदाता सूची में दर्ज थीं। उदाहरण के लिए, बेलगावी जिले के रायबाग में 17 मई को एक मामला आया।
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यहां गंगूबाई वड्डर नाम की महिला ने फॉर्म भरकर कहा कि रुक्मिणी वड्डर की मौत हो चुकी है, इसलिए उनका नाम हटाया जाए। ठीक उसी दिन, रुक्मिणी वड्डर ने भी चुनाव आयोग में फॉर्म जमा कर दिया कि गंगूबाई वड्डर तो मर चुकी हैं। अब चुनाव अधिकारी इस उलझन में हैं कि अगर दोनों जीवित हैं, तो क्या उनके बीच कोई आपसी दुश्मनी थी, या फिर किसी ने उनके नाम का गलत इस्तेमाल किया?
ये अनोखा ट्रेंड राज्य के 25 से ज्यादा जिलों में देखने को मिला है। सबसे ज्यादा ऐसे मामले बेलगावी (160 मामले) और कालाबुरागी (80 मामले) से सामने आए। वहीं मैसूर जिले के सभी 28 मामले अकेले ‘चामुंडेश्वरी’ विधानसभा क्षेत्र में ही दर्ज किए गए।
सॉफ्टवेयर का ‘लोचा’ या इंसानी लापरवाही?
जब इस मामले की गहराई में जाकर ग्राउंड लेवल के अधिकारियों (BLO ) से बात की गई, तो जो सच निकलकर सामने आया, वह और भी दिलचस्प था। ब्याटरायनपुरा का अजीब केस: ब्याटरायनपुरा में 25 साल की सुधा के.एन. के नाम से फॉर्म 7 भरा गया, जिसमें उन्होंने खुद को मृत बताया।
लेकिन जब अधिकारी से पूछा गया, तो बीएलओ ने बताया कि असल में सुधा ने अपने पति श्रीकांत का नाम हटाने के लिए आवेदन दिया था। पर सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी के कारण पति श्रीकांत की जगह सुधा का ही नाम दर्ज हो गया! अब बीएलओ मैडम को भी नहीं पता कि यह सॉफ्टवेयर की खराबी थी या डेटा एंट्री करने वाले की गलती।
संडूर की कहानी
यहां 30 साल के हनुमानथा ने खुद को मृत बताते हुए नाम हटाने की अर्जी दी। जब उच्च अधिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘सॉफ्टवेयर ग्लिच’ (तकनीकी खराबी) करार दिया, जबकि बूथ स्तर की अधिकारी को तो यह पता ही नहीं था कि ऐसा कोई फॉर्म भरा भी गया है!
मागडी का हवा-हवाई नंबर
मागडी विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन (भाग संख्या 268) में मनीष गौड़ा नाम के युवक ने फॉर्म भरा। उनका सीरियल नंबर 416 दर्ज था, जबकि उस बूथ की कुल ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कुल मिलाकर केवल 415 वोटर ही थे! यानी 416वां नंबर तो अस्तित्व में ही नहीं था।
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कब और कैसे हुआ यह पूरा घटनाक्रम?
कर्नाटक में 30 जून से वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण ( SIR) का काम शुरू हुआ था। मजेदार बात यह है कि खुद को मृत घोषित करने वाले और एक-दूसरे को मारने वाले ज्यादातर फॉर्म जून महीने में ही जमा किए गए थे। अकेले जून के महीने में 333 ऐसे फॉर्म भरे गए।
हालांकि, जब चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित कर दी, उसके बाद भी सितंबर के महीने में (17 से 26 सितंबर के बीच) तीन ऐसे फॉर्म सामने आए जहाँ जीवित लोगों ने खुद को कागजों में मृत बता दिया था।
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अब आगे क्या?
चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन के लिए यह मामला हंसने से ज्यादा सिरदर्द का कारण बन चुका है। चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि यह कोई साजिश है, चुनावी डेटा एंट्री की भारी चूक है, या फिर ऑनलाइन सिस्टम का टेक्निकल ग्लिच, इसकी जांच की जा रही है
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