गजबः सीनियर अफसर को लिखित बोले अपशब्द, फिर भी पा लिया प्रमोशन!

ADVERTISEMENTS Ad
ख़बर शेयर करें

junior-officer-kundan-kumar-promotion-who-abusive-language-writing-against-ifs-officer-sanjiv-chaturvedi

उत्तराखंड शासन और वन विभाग में अनुशासन, निष्पक्षता और नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अपने ही वरिष्ठ और नियंत्रक अधिकारी के खिलाफ लिखित शासकीय पत्रों में कथित रूप से अमर्यादित और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के गंभीर आरोपों में घिरे एक कनिष्ठ अधिकारी पर कार्रवाई करने के बजाय शासन ने उन्हें प्रमोशन और केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का बड़ा तोहफा दे दिया।

नक्शेदेखें

तो इसके खिलाफ अदालत जाएंगे सीनियर IFS संजीव चतुर्वेदी

सूत्रों के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम में अनुशासनिक जांच की सिफारिशों को दरकिनार करने और वन विभाग से ही सूचना का अधिकार (RTI) के तहत आधी-अधूरी जानकारियां मिलने से नाराज होकर मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एवं वरिष्ठ IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी अब राज्य सूचना आयोग और शासन की इस कार्यप्रणाली के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

उत्तराखंड वन विभाग के आधिकारिक पत्राचार से जुड़े इस मामले को प्रशासनिक गलियारों में आचरण और मर्यादा की सभी सीमाएं लांघने वाला माना जा रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) डॉ. समीर सिन्हा ने उत्तराखंड शासन के प्रमुख सचिव (वन एवं पर्यावरण) को एक अति-गोपनीय और तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजी थी। इस रिपोर्ट में दर्ज था कि वर्ष 2017 बैच के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) कुंदन कुमार ने अपने बचाव के दौरान एक शासकीय पत्र पेश किया था। यह पत्र मूल रूप से उनके वरिष्ठ अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को संबोधित था, जिसमें उनके प्रति बेहद आपत्तिजनक, असंसदीय और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया था।

नक्शेदेखें

HoFF की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि किसी भी ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारी का अपने वरिष्ठ और नियंत्रक अधिकारी के खिलाफ ऐसा व्यवहार अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 के नियम 3 और नियम 9 का सीधा उल्लंघन है। रिपोर्ट में इसे वरिष्ठ अफसर का व्यक्तिगत चरित्र हनन करने और उन्हें नीचा दिखाने की सोची-समझी कोशिश करार दिया गया था। इसके साथ ही मातहत कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने और सरकारी कामकाज को ठप करने के लिए उकसाने के भी गंभीर आरोप लगे थे।

जांच की सिफारिश दरकिनार, झटपट प्रमोशन और मनचाही पोस्टिंग

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे हैरान करने वाला पहलू शासन स्तर पर दिखाई देने वाला दोहरा रवैया है। सूत्रों के अनुसार, प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) ने 18 अक्टूबर 2025 को ही प्रमुख सचिव (वन) को पत्र भेजकर आरोपी अधिकारी के खिलाफ अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली के तहत सख्त विभागीय कार्रवाई करने की स्पष्ट सिफारिश की थी।

लेकिन इस सिफारिश पर सख्त एक्शन लेने के बजाय फाइल को शासन में करीब 70 दिनों तक दबाए रखा गया। इसके बाद विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक में उन्हें क्लीन चिट की तरह पेश करते हुए कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (JAG – Level 12) में प्रमोट कर दिया गया।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। विभागीय स्तर पर गंभीर आरोप और पत्राचार की सत्यता संदिग्ध होने के बावजूद जुलाई 2026 में केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा आरोपी अधिकारी को देहरादून स्थित प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) में 4 साल के लिए एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति दे दी गई। यानी एक तरफ जहां वरिष्ठ अधिकारी अपनी शिकायत लेकर भटकते रहे, वहीं दूसरी तरफ आरोपी अधिकारी को एक के बाद एक प्रशासनिक तोहफे मिलते चले गए।

नक्शेदेखें

RTI और मुख्य सूचना आयोग के रुख से गहराया असंतोष

प्रशासनिक स्तर पर हो रही इस अनदेखी के बीच वरिष्ठ IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने 21 जनवरी 2026 को RTI के तहत 7 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारियां मांगी थीं। इसमें प्रमोशन समिति के फैसले, पत्राचार की कॉपियां और जांच से जुड़े अहम दस्तावेज शामिल थे। लेकिन जब तय समय सीमा में संतोषजनक जानकारी नहीं मिली, तो उन्होंने पहले प्रथम अपील और फिर राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दाखिल की।

मामला जब राज्य सूचना आयोग पहुंचा, तो मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष जन सूचना अधिकारी (PIO) ने तर्क दिया कि मांगी गई जानकारियां अन्य अफसरों की व्यक्तिगत सूचना से जुड़ी हैं और मामले में विभागीय जांच चल रही है, इसलिए पूरे दस्तावेज नहीं दिए जा सकते। आयोग ने PIO के इस तर्क को सही मानते हुए केवल 2 बिंदुओं पर सीमित सूचना देने का आदेश दिया और बाकी अहम जानकारियों को छुपाने के विभाग के फैसले पर मुहर लगा दी।

अदालत जाने की तैयारी: विधिक आधार हैं मजबूत

सूत्रों का कहना है कि राज्य सूचना आयोग के इस ढुलमुल रुख और शासन द्वारा अनुशासनहीनता के आरोपी अधिकारी को कथित तौर पर संरक्षण दिए जाने से आहत होकर संजीव चतुर्वेदी ने अब इस मामले को कानूनी मंच पर ले जाने का मन बना लिया है। वे जल्द ही मुख्य सूचना आयुक्त के इस आदेश और शासन के भेदभावपूर्ण रवैये को हाईकोर्ट में चुनौती देने जा रहे हैं।कानूनी जानकारों के मुताबिक, उनके पास अदालत में जाने के बेहद ठोस आधार मौजूद हैं:

RTI की धारा 8(1)(h) का गलत इस्तेमाल

दिल्ली हाईकोर्ट के प्रसिद्ध Bhagat Singh v. CIC मामले के नजीर के अनुसार, महज ‘जांच पेंडिंग’ होना सूचना रोकने का वैध कारण नहीं हो सकता। विभाग को यह साबित करना होता है कि सूचना देने से जांच कैसे प्रभावित होगी।

जांच पेंडिंग होने का दावा पूरी तरह खोखला

 आरोपी अधिकारी को केंद्र में प्रतिनियुक्ति मिल चुकी है। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए विजिलेंस क्लीयरेंस अनिवार्य होती है। अगर विजिलेंस क्लीयरेंस मिल गई है, तो इसका सीधा मतलब है कि कोई जांच पेंडिंग नहीं है। ऐसे में RTI में जांच का बहाना बनाकर सूचना रोकना सरासर गैर-कानूनी है।

DPC से तथ्य छुपाने का मामला:

सुप्रीम कोर्ट के Bhajan Singh v. State of Uttarakhand फैसले के तहत प्रमोशन कमेटी (DPC) के सामने किसी अधिकारी के खिलाफ पेंडिंग जांच या गंभीर आरोपों की जानकारी छुपाना गैर-कानूनी है।

नक्शेदेखें

सार्वजनिक हित की अनदेखी

सरकारी पत्रों में अभद्र भाषा लिखना, मातहतों को हड़ताल के लिए भड़काना और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करना कोई व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर पब्लिक इंटरेस्ट और प्रशासनिक शुचिता से जुड़ा मुद्दा है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

मामला अदालत में पहुंचने पर न केवल सूचना आयोग के इस आदेश की न्यायिक समीक्षा होगी, बल्कि उत्तराखंड शासन और वन विभाग के उन आला अफसरों की कार्यशैली भी जांच के दायरे में आएगी जिन्होंने इस पूरे मामले में आंखें मूंद रखी थीं। अब देखना यह होगा कि अदालत की चौखट पर पहुंचने के बाद इस अनोखे और अभूतपूर्व प्रशासनिक मामले में क्या मोड़ आता है

ADVERTISEMENTS