बड़ी खबर:- क्या हल्द्वानी के अवैध पीजी को भी दिल्ली जैसी त्रासदी का इंतजार?

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हल्द्वानी। दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के अचानक भरभराकर गिरने और उसमें छात्रों की मौत की घटना ने देशभर में छात्र आवास और पीजी व्यवस्था की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के वक्त इमारत में बड़ी संख्या में छात्र मौजूद थे। इस घटना ने उस खतरे की ओर भी ध्यान खींचा है, जिसे अक्सर शहरों में बढ़ते पीजी और हॉस्टल कारोबार की चमक के पीछे नजरअंदाज कर दिया जाता है।
सवाल अब हल्द्वानी से भी पूछा जाना चाहिए क्या शहर के रिहायशी इलाकों में नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे पीजी सेंटरों की जांच के लिए प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? हल्द्वानी में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ छात्रों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं और नौकरीपेशा लोगों के लिए पीजी आवास की मांग लगातार बढ़ी है। इसके साथ ही शहर की कई रिहायशी कॉलोनियों और इलाकों में मकानों को पीजी के रूप में संचालित किए जाने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। आरोप है कि कुछ जगहों पर आवासीय भवनों का व्यावसायिक इस्तेमाल तो हो रहा है, लेकिन सुरक्षा और वैधानिक औपचारिकताओं का पालन कितना किया जा रहा है, इसकी तस्वीर साफ नहीं है। पीजी में रहने वाले अधिकांश छात्र और युवा अपने परिवार से दूर होते हैं। जिस मकान को वे कुछ महीनों या वर्षों के लिए अपना घर समझकर किराए पर लेते हैं, उसकी संरचनात्मक स्थिति, बिजली व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास और भवन की क्षमता की उन्हें जानकारी तक नहीं होती। कई बार किराएदार के लिए सवाल सिर्फ इतना होता है कि कमरा कितना बड़ा है, किराया कितना है और खाना मिलेगा या नहीं। लेकिन असली सवाल यह है कि अगर रात में आग लग जाए, भूकंप आ जाए या भवन का कोई हिस्सा अचानक कमजोर होकर गिर जाए तो बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता क्या है? यही सवाल दिल्ली की घटना के बाद हल्द्वानी में भी प्रशासन के सामने खड़ा होता है। पीजी संचालन को लेकर विभिन्न स्तरों पर अनुमति, पंजीकरण, सत्यापन और सुरक्षा से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं। लेकिन सवाल नियमों के होने का नहीं, बल्कि उनके पालन और निगरानी का है। यदि किसी आवासीय भवन में बड़ी संख्या में छात्र या कामकाजी युवा रह रहे हैं तो क्या संबंधित विभागों ने यह सुनिश्चित किया है कि भवन उनकी संख्या के अनुरूप सुरक्षित है? क्या फायर सेफ्टी व्यवस्था की जांच की गई है? क्या बिजली के कनेक्शन और वायरिंग सुरक्षित हैं? क्या आपात स्थिति में बाहर निकलने के पर्याप्त रास्ते हैं? क्या भवन की संरचनात्मक स्थिति की जांच हुई है? क्या वहां रहने वाले लोगों का सत्यापन किया गया है? और सबसे महत्वपूर्ण इन सवालों के जवाब देने की जिम्मेदारी किस विभाग की है? हमारे शहरों में अक्सर एक पुरानी तस्वीर दिखाई देती है। हादसा होता है, टीमें मौके पर पहुंचती हैं, जांच के आदेश होते हैं, जिम्मेदारी तय करने की बात कही जाती है और कुछ समय बाद मामला शांत हो जाता है। लेकिन सवाल यह है कि हादसा होने से पहले जांच क्यों नहीं होती? दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए हादसे ने यह याद दिलाया है कि कमजोर या जोखिम वाले भवन में रहने वाले लोगों के लिए खतरा सिर्फ एक संभावना नहीं है। वह कभी भी वास्तविक दुर्घटना में बदल सकता है। हल्द्वानी में भी यदि किसी पीजी भवन में क्षमता से अधिक लोग रह रहे हों, भवन पुराना हो, अवैध निर्माण हुआ हो, बेसमेंट या आसपास खुदाई चल रही हो, बिजली की वायरिंग असुरक्षित हो अथवा आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने का रास्ता पर्याप्त न हो, तो प्रशासन की जिम्मेदारी केवल शिकायत आने के बाद शुरू नहीं होनी चाहिए। पीजी संचालक व्यवसाय कर रहे हैं, इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। शहर में बाहर से आने वाले छात्रों और युवाओं को सुरक्षित और किफायती आवास की जरूरत है और पीजी व्यवस्था इस जरूरत को पूरा कर सकती है। लेकिन कमरे बढ़ाकर किराया कमाने और सुरक्षा के इंतजाम करने के बीच यदि संतुलन खत्म हो जाए तो यही सुविधा खतरे में बदल सकती है। प्रशासन को यह भी देखना होगा कि जिन मकानों में सामान्य रूप से सीमित संख्या में लोग रहने के लिए भवन बनाए गए हैं, उनमें व्यावसायिक तौर पर बड़ी संख्या में छात्रों को तो नहीं ठहराया जा रहा। यदि ऐसा हो रहा है तो भवन की क्षमता, अग्नि सुरक्षा और अन्य आवश्यक मानकों की जांच जरूरी है।
दिल्ली की घटना को चेतावनी मानते हुए हल्द्वानी में रिहायशी इलाकों में संचालित पीजी और हॉस्टलों का संयुक्त और पारदर्शी सर्वे कराया जाना चाहिए। प्रशासन, नगर निगम, अग्निशमन विभाग, पुलिस/एलआईयू और संबंधित विभागों को अपने-अपने स्तर पर रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए।
प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शहर में कितने पीजी और हॉस्टल पंजीकृत हैं? कितने आवासीय भवनों में व्यावसायिक रूप से पीजी संचालित हो रहे हैं? कितने भवनों की फायर सेफ्टी जांच हुई है? कितने संचालकों के पास आवश्यक अनुमति या पंजीकरण है? भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच कब और किसके द्वारा की गई? किराएदारों का पुलिस सत्यापन और रिकॉर्ड किस स्तर पर रखा जा रहा है? नियमों का उल्लंघन मिलने पर अब तक कितने संचालकों के खिलाफ कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब सिर्फ कागजों में नहीं, सार्वजनिक रूप से सामने आने चाहिए। कुल मिलाकर दिल्ली की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन हादसों से सबक लेता है या हादसों का इंतजार करता है। हल्द्वानी में हजारों छात्र और युवा ऐसे भवनों में रह रहे हो सकते हैं, जिन्हें वे सुरक्षित मानकर अपने घर से दूर जीवन शुरू करते हैं। उन्हें यह अधिकार है कि जिस कमरे का किराया वे दे रहे हैं, वहां उनकी जान की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसलिए सवाल किसी एक पीजी संचालक का नहीं है। सवाल पूरी व्यवस्था का है। क्या हल्द्वानी प्रशासन अवैध और असुरक्षित पीजी की जांच अभी करेगा, या फिर किसी दिल्ली जैसे हादसे के बाद मलबे से जवाब तलाशे जाएंगे? क्योंकि आज कार्रवाई का वक्त है। कल शायद बहुत देर हो जाए।

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