उत्तराखंड की दो सगी बहनों ने अपने खून से राष्ट्रपति को पत्र लिखकर पूछा—जब एक बेटी को न्याय नहीं, तो देश की बेटियाँ कैसे सुरक्षित?

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अंकिता भण्डारी को न्याय नहीं तो व्यवस्था के विरुद्ध आख़िरी प्रतिरोध—राष्ट्रपति को बहनों का रक्त-पत्र।

उत्तराखंड की दो सगी बहनों ने अपने खून से राष्ट्रपति को पत्र लिखकर पूछा—जब एक बेटी को न्याय नहीं, तो देश की बेटियाँ कैसे सुरक्षित?

उत्तराखंड की धरती से उठा यह दृश्य न केवल सरकार और व्यवस्था, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है। अंकिता भण्डारी हत्याकांड में न्याय में हो रही देरी से आहत दो सगी बहनों ने ऐसा प्रतिरोध चुना, जिसने संवैधानिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। बहनों ने अपने खून से महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सीधा सवाल किया—जब एक बेटी को न्याय नहीं मिलता, तो देश की बाकी बेटियाँ कैसे सुरक्षित मानी जाएँ?

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खून से पत्र लिखने वाली छोटी बहन संजना, काशीपुर स्थित तारावती बालिका विद्या मंदिर की कक्षा 10 की छात्रा है। उम्र भले कम हो, लेकिन उसके सवाल सत्ता के शिखर तक पहुँच चुके हैं। संजना और उसकी बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई मूल रूप से सल्ट विधानसभा, जनपद अल्मोड़ा की निवासी हैं—एक साधारण पहाड़ी परिवार की बेटियाँ, जिन्होंने यह जता दिया कि जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो बेटियाँ अपनी देह की अंतिम सीमा तक जाकर भी सवाल करती हैं।

बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई कोई साधारण नागरिक नहीं हैं। वह किसान मंच की प्रदेश प्रवक्ता और पहाड़ों फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी कुसुम लता का कहना है कि अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने की हर संवैधानिक कोशिश जब अनसुनी होती रही, तो यह खून से लिखा पत्र “निवेदन” नहीं, बल्कि सत्ता के मुँह पर करारा तमाचा है।

पत्र में साफ शब्दों में कहा गया है कि यह केवल एक हत्या का मामला नहीं, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा की हत्या है। सबूतों के नष्ट होने की चर्चाएँ, गवाहों पर दबाव की आशंकाएँ और प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने के आरोप—इन सबके बीच न्याय में देरी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है? बहनों का कहना है कि यह रक्त-पत्र उस संवेदनहीन व्यवस्था के खिलाफ अंतिम चेतावनी है।

कुसुम लता बौड़ाई ने सरकार को घेरते हुए कहा कि लंबे समय से “जाँच जारी है” जैसे जुमलों से जनता को चुप कराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि छात्राएँ और बेटियाँ अपने खून से न्याय की गुहार लगाने को मजबूर हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय मिलने तक यह संघर्ष नहीं रुकेगा—चाहे इसकी कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

इस घटना ने सोशल मीडिया से लेकर सामाजिक संगठनों तक जबरदस्त हलचल मचा दी है। महिला अधिकार समूहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे न्याय के लिए अब तक का सबसे झकझोर देने वाला प्रतीकात्मक प्रतिरोध बताया है। लोगों का कहना है कि यह तस्वीर बताती है कि सरकार और व्यवस्था ने जनता को किस हद तक निराश कर दिया है, जब एक नाबालिग छात्रा को भी राष्ट्रपति से न्याय माँगने के लिए अपना खून इस्तेमाल करना पड़ा।

दो सगी बहनों का यह कदम सरकार के लिए एक कठोर आईना है। अब यह सवाल केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा—यह सड़कों, स्कूलों, घरों और समाज के विवेक में गूंज रहा है—क्या बेटियों को इंसाफ पाने के लिए खून से लिखना पड़ेगा?
अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने की यह लड़ाई अब किसी एक परिवार या संगठन की नहीं रही। यह पूरे समाज की आवाज़ बन चुकी है—और यह आवाज़ तब तक गूंजती रहेगी, जब तक सत्ता जवाब देने को मजबूर नहीं हो जाती

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