ट्रेन में आई झपकी से बदल गई पूरी जिंदगी… हिंदू बच्चे को मुस्लिम परिवार ने पाला-पोसा, नाम रखा अब्दुल, 31 साल बाद घर लौटे पिंटू की कहानी
यह कहानी सिर्फ पिंटू के घर लौटने की नहीं, बल्कि उस इंसानियत की भी है, जिसने एक अनजान बच्चे को सहारा दिया. साथ ही यह उस मां के इंतजार की कहानी है, जिसकी आंखें 31 साल बाद बेटे को देखकर नम हो गईं.
31 साल का लंबा इंतजार… मां की आंखों में बेटे की एक झलक पाने की उम्मीद… और अचानक एक दिन दरवाजे पर खड़ा हो गया वही बेटा, जिसे परिवार ने बचपन में खो दिया था. लेकिन इस बार वह सिर्फ पिंटू यादव नहीं था. उसकी पहचान बदल चुकी थी. वह अब अब्दुल जब्बार बन चुका था. उसकी जिंदगी में एक नहीं, बल्कि दो परिवार थे. एक परिवार जिसने उसे जन्म दिया और 31 साल तक उसके लौटने की आस लगाए बैठा रहा. दूसरा परिवार, जिसने अनजान बच्चे को सहारा दिया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया और अपने घर का सदस्य बनाया.
कटिहार जिले के मनिहारी प्रखंड के कांटाकोष गांव में सामने आई यह कहानी सिर्फ एक बिछड़े बेटे के घर लौटने की नहीं, बल्कि रिश्तों, धर्म, पहचान और इंसानियत के बीच खड़े एक ऐसे सवाल की है, जिसका जवाब आसान नहीं है. 31 साल बाद अपने जन्मस्थान लौटे पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह किस परिवार के साथ रहे? जन्म देने वाले माता-पिता के साथ या उस परिवार के साथ, जिसने उसे अनजान रास्तों से उठाकर जिंदगी का सहारा दिया?
आठ साल की उम्र में ट्रेन में बिछड़ गया था पिंटू
कहानी की शुरुआत वर्ष 1995 से शुरू होती है. कांटाकोष गांव के रहने वाले मोतीलाल यादव और मीणा देवी का बेटा पिंटू करीब आठ साल की उम्र में अपने दोस्तों के साथ ट्रेन में चढ़ गया था. सफर के दौरान उसे नींद आ गई. उसके दोस्त तो ट्रेन से उतर गए, लेकिन पिंटू नींद में ही ट्रेन में रह गया.
जब उसकी आंख खुली तो वह अपने गांव से बहुत दूर पश्चिम बंगाल के राधिकापुर इलाके में पहुंच चुका था. अनजान जगह, अनजान लोग और सामने जिंदगी की एक नई चुनौती. बचपन में अपने परिवार से बिछड़े इस बच्चे को यह भी नहीं मालूम था कि वह अपने घर कैसे लौटेगा. इसी दौरान हरिकृष्णपुरी निवासी अब्दुल रहीम नाम के व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी. उन्होंने बच्चे को सहारा दिया और अपने घर ले गए. अब्दुल रहीम ने उसे अपने परिवार का हिस्सा बनाया, उसका पालन-पोषण किया और उसे नई जिंदगी दी.
धीरे-धीरे उसकी पहचान भी बदल गई. बचपन का पिंटू यादव अब अब्दुल जब्बार के नाम से पहचाना जाने लगा. समय बीतता गया और वह इसी पहचान के साथ बड़ा हुआ. समय के साथ अब्दुल जब्बार की जिंदगी पश्चिम बंगाल में ही आगे बढ़ती रही. उसकी शादी कालियाचक की मुतैना खातून से हुई. आज उसके दो बेटे और एक बेटी हैं.
एक ओर उसका अपना परिवार बस चुका था, तो दूसरी ओर कटिहार के कांटाकोष गांव में उसके जन्मदाता माता-पिता की जिंदगी बेटे की यादों के सहारे गुजर रही थी. 31 साल तक परिवार को यह पता नहीं था कि उनका बेटा कहां है, किस हाल में है और क्या वह कभी वापस लौटेगा भी या नहीं. लेकिन नियति ने एक दिन ऐसा मोड़ लिया कि वर्षों से बिछड़े रिश्ते फिर से जुड़ने लगे.
दिल्ली में मजदूरी के दौरान जागी घर लौटने की उम्मीद
अब्दुल जब्बार ने बताया कि वह मजदूरी करने के लिए दिल्ली गया था. वहां काम करने के दौरान उसकी दोस्ती मनिहारी के कुछ लोगों से हुई. बातचीत के दौरान उसने अपने दोस्तों को बताया कि उसका घर मनिहारी में है. उसके पिता का नाम मोतीलाल यादव है और उसका गांव गंगा किनारे स्थित है.
बस, यहीं से उसके बिछड़े परिवार की तलाश शुरू हुई. उसके दोस्त ने मनिहारी में उसके पिता के नाम और गांव से जुड़ी जानकारी जुटानी शुरू की. काफी पूछताछ के बाद कांटाकोष गांव में मोतीलाल यादव के परिवार का पता मिल गया. इस बीच एक दोस्त ने उसे मनिहारी में गेहूं की फसल से जुड़ा एक वायरल वीडियो दिखाया. वीडियो देखकर उसके मन में अपने गांव लौटने की उम्मीद फिर से जाग उठी.
बताया जा रहा है कि वह इससे पहले भी दो बार कांटाकोष आने की कोशिश कर चुका था, लेकिन इस बार उसने अपने जन्मदाता परिवार तक पहुंचने का पक्का फैसला कर लिया.
आंखों के ऊपर पुराने जख्म के निशान ने कराई पहचान
जब पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार कांटाकोष गांव पहुंचा तो स्थानीय लोगों की मदद से अपने परिवार तक पहुंचने में कामयाब हुआ. 31 साल बाद सामने खड़े बेटे को देखकर मां की आंखें नम हो गईं. हालांकि, इतने लंबे समय के बाद बदले हुए चेहरे को देखकर मां शुरुआत में उसे तुरंत पहचान नहीं पाईं. लेकिन जब उसकी आंख के ऊपर कटने का पुराना निशान देखा, तो बचपन की यादें ताजा हो गईं. शरीर पर मौजूद पुराने जख्मों के निशान और बचपन की कुछ ऐसी बातें, जिन्हें परिवार के अलावा कोई दूसरा नहीं जान सकता था, उसकी पहचान का आधार बनीं.
परिजनों और ग्रामीणों को विश्वास हो गया कि यह वही पिंटू है, जो 31 साल पहले अपने परिवार से बिछड़ गया था. इसके बाद मां, पिता और भाई ने उसे गले लगा लिया. वर्षों से बिछड़े बेटे की वापसी ने पूरे परिवार को भावुक कर दिया. पिंटू के घर लौटने की खबर गांव में आग की तरह फैल गई. देखते ही देखते बड़ी संख्या में ग्रामीण उसके घर पहुंचने लगे.
लोग आश्चर्य से पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार को देखते रहे और उसके 31 साल तक परिवार से दूर रहने की कहानी सुनते रहे. पिंटू के भाई मुन्ना यादव, अजीत यादव, सुभाष यादव, राहुल यादव, विक्रम यादव, सूरज यादव और बहन पुष्पा देवी सहित परिवार के अन्य सदस्य उसकी वापसी से बेहद खुश हैं.
अब रिश्तों की उधेड़बुन में पिंटू
इस कहानी का सबसे मार्मिक पहलू अब सामने आ रहा है. 31 साल बाद अपने जन्मदाता परिवार से मिलने वाला पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार अब दो परिवारों के बीच भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. एक ओर वह परिवार है, जिसने उसे जन्म दिया. मां मीणा देवी और पिता मोतीलाल यादव, जिन्होंने 31 साल तक अपने बेटे के लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ी.
दूसरी ओर वह परिवार है, जिसने उसे बचपन में अनजान जगह पर सहारा दिया. अब्दुल रहीम ने उसे अपने घर में जगह दी, उसका पालन-पोषण किया और उसे एक नई पहचान दी. उसी परिवार के साथ उसका बचपन बीता, उसी जमीन पर उसकी जिंदगी आगे बढ़ी और वहीं उसकी शादी हुई. आज उसकी पत्नी मुतैना खातून और तीन बच्चे हैं.
ऐसे में उसके लिए किसी एक परिवार को छोड़ना आसान नहीं है. जन्म देने वाले माता-पिता के प्रति उसका भावनात्मक लगाव है, तो पालने वाले परिवार के प्रति भी उसका गहरा जुड़ाव है. पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार का कहना है कि वह दोनों परिवारों के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है.
कटिहार की यह कहानी कई सवाल छोड़ जाती है. क्या रिश्ते सिर्फ जन्म से बनते हैं? क्या किसी बच्चे को पालने-पोसने वाला परिवार उसके जीवन में जन्मदाता परिवार जितना ही महत्वपूर्ण नहीं होता? और क्या धर्म व नाम बदल जाने से बचपन की यादें और रिश्तों का अपनापन मिट जाता है? पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार की जिंदगी इन सवालों का जवाब अपने तरीके से देती नजर आती है.
31 साल पहले ट्रेन में बिछड़ा एक बच्चा आज दो परिवारों के बीच खड़ा है. एक परिवार उसकी वापसी से खुश है, तो दूसरा परिवार उसकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है.
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