कहीं चौतरफा घिर तो नहीं रही सत्तारूढ़ भाजपा!

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बीते एक वर्ष का संपूर्ण अध्ययन करें तो भारतीय जनता पार्टी को विपक्ष ने चौतरफा घेर रखा है। पहले तो लगता था कि विपक्ष को भारतीय जनता पार्टी समय पर चित कर देगी  लेकिन इस बार भाजपा का कोई आरोप और कोई रणनीति विपक्ष को घेरने के मुद्दे पर सफल होती दिख नहीं रही है। और इस घेराव  के परिणाम भी अब दिखाई देने लगे हैं। अगर हाल ही में हुए एमएलसी चुनावों का समीक्षात्मक अध्ययन करेंगे तो स्नातक और पढ़े- लिखे  लोगों का माना जाने वाला यह चुनाव का परिणाम यह सोचने को विवश कर रहा है कि क्या भाजपा के कोर वोटर (पढ़ा-लिखा वर्ग) का मूड उसकी ओर से बदलता दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने देश की ऐसी सीटों पर हार का स्वाद चखा है जहां से उसको ऊर्जा मिलती है। पहले यूपी की बात करें तो यूपी की सबसे अहम सीटें-अयोध्या, मथुरा, काशी, आगरा, गोरखपुर और लखनऊ हैं और अयोध्या तो लोकसभा चुनाव में  भाजपा के हाथों से निकल गयी थी। और अब एमएलसी के परिणामों की बात करें तो गोरखपुर किसी तरह हांफते-हांफते भाजपा जीत की रेखा छू सकी। बाकी सभी जगह उसे निराशा ही हाथ लगी।

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तो क्या मान लेना चाहिए कि भाजपा को घेरने  की विपक्ष की रणनीति काम आने लगी है। या फिर भाजपा की यह कोई रणनीति का हिस्सा है ताकि विपक्ष चुनाव आयोग पर लचर रवैया अपनाये और ऐसा होता भी दिख रहा है क्योंकि एमएलसी चुनाव परिणामों के बाद कोई भी चुनाव आयोग पर बड़ा हमला नहीं बोल रहा है। इससे यह भी एहसास होता है कि भाजपा एमएलसी चुनाव में जान-बूझकर हार का घूंट  पी रही हो ताकि जब आने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम आये तो कोई आयोग पर उंगली न उठा सके। हालांकि माकूल जीत मिलने के बावजूद विपक्ष के तेवर चुनाव आयोग को लेकर बहुत ढीले नहीं पड़े हैं लेकिन भाजपा अब सतर्क हो गयी है। इसीलिए एमएलसी चुनाव परिणाम आने के बाद अगले दिन भाजपा के चाणक्य अमित शाह जब लखनऊ धमके तो उन्होंने अपने काडर को कड़े संदेश देकर साफ बता दिया कि अब घर से निकलना ही पड़ेगा। 

शाह ने यह भी साफ कर दिया कि चुनाव योगी आदित्यनाथ के नाम पर ही लड़ा जायेगा। मतलब साफ है कि भाजपा ऐसा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती जिससे कोई गलत संदेश जाये और गोरखपुर में किसी तरह हासिल की गयी जीत और वाराणसी की हार ने केंद्र पर दबाव भी बनाया है कि यूपी में योगी को छेड़ना उसे भारी पड़ सकता है। यूपी को सत्ता का केंद्र भी कहा जाता है। इसीलिए अब अमित शाह यूपी को अपनी क्षमता का केंद्र भी बनायेंगे ताकि यह संदेश दे सकें कि यूपी अब अकेले योगी के वश की बात नहीं उनको लगना ही पड़ेगा। यह इसलिए भी अगर 2०27 में जीत का सेहरा भाजपा के सिर पर चढ़े तो उसका क्रेडिट अकेले योगी आदित्यनाथ के सिर पर न मिले। 

हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) चुनावों में भाजपा ने 11 में से 6 सीटें जीतीं लेकिन समाजवादी पार्टी ने भी कड़ी टक्कर देते हुए 5 सीटें (जिनमें वाराणसी की सीट भी शामिल है) अपने नाम कीं। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि भाजपा का प्रभाव कम हो रहा है। महाराष्ट्र के MLए चुनावों में विपक्षी महाविकास अघाड़ी ने नागपुर और पुणे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जीत हासिल कर भाजपा गठबंधन को कड़ी चुनौती दी है। नागपुर जैसी जगह (जो संघ का गढ़ मानी जाती है) में कांग्रेस की जीत को विपक्ष एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक बहसों में विपक्ष लगातार बढ़ती महंगाई, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहा है।

लेकिन यह कहना कि भाजपा पूरी तरह से ”घिर चुकी है’’, चुनावी हकीकत के मुताबिक पूरी तरह सही भी नहीं होगा क्योंकि बंगाल जैसे बड़े राज्यों में उसने बड़ी जीत हासिल की है। हालांकि, यह जरूर है कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के स्थानीय व परिषद चुनावों में विपक्ष ने मजबूत वापसी की है, जिससे आगामी चुनावों में मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा होने की उम्मीद है जबकि वर्ष 2०26 के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का देश के एक बड़े भूभाग और लगभग 2० से अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों पर शासन है। 2०26 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पहली बार ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सरकार बनाई जिसे पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी सफलता माना गया। असम में भी पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, देश की लगभग 78% जनसंख्या पर भाजपा या उसके सहयोगियों का शासन प्रभाव है, जो उनके मजबूत आधार को दर्शाता है। 

इसलिए यह मान लेना कि भाजपा पूरी तरह घिर चुकी है, पूरा सच नहीं है लेकिन यह भी तय है कि उसको विपक्ष ने घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ी है। तस्वीर तो 2०27 के विधानसभा चुनावों में तय होगी और यहीं की जीत उसकी असली ताकत का परिचय देगी लेकिन इसी तस्वीर का एक कड़वा रुख यह भी है कि एमएलसी चुनावों में समाजवादी पार्टी को मिली 5 सीटों के चलते वह बहुत उत्साह में हैं और सपा के कार्यकर्ताओं ने मान लिया है कि अब मानो जीत उनके कदमों में है बस पर्चा भरने की देर है। यह अति उत्साह सपा को चौपट भी कर सकता है। सपा कार्यकर्ता यह कहते हुए दिख रहे हैं कि हम सरकार बनाने जा रहे हैं। सपा इसी उत्साह में अब कांग्रेस को भी बहुत तरजीह देती नहीं दिख रही है। इसके चलते यह भी संभव है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन हो तो जायेगा लेकिन बहुत कम्फर्टेबल  नहीं रहेगा। अंदरूनी खींचतान रहेगी  जिसके चलते कार्यकर्ता पशोपेश में रहेगा। फिलहाल अभी सब समय के गर्भ में है और परिणाम मार्च में पता चलेगा।

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