मोदी कैबिनेट में बड़ा फेरबदल! अमित शाह को मिल सकता है उप-प्रधानमंत्री का पद?
भारत और चीन के बीच के रिश्तों को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए चार चीनी मूल की कंपनियों को भारत की सरकारी बिजली परियोजनाओं में बोली (टेंडर) लगाने की इजाजत दे दी है। साल 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद से भारत ने चीनी कंपनियों पर सख्त पाबंदियां लगा दी थीं, जिसके तहत सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने के लिए विशेष सुरक्षा मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी। लेकिन अब, इन चार कंपनियों को इस प्रक्रिया से बड़ी राहत दी गई है।
आखिर किन कंपनियों को मिली एंट्री?
वित्त मंत्रालय के 24 जून के आदेश के मुताबिक, TV एनर्जी नजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया और न्यू नर्थ ईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया जैसी कुल चार चीनी कंपनियों को अब सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने की मंजूरी मिल गई है। सरकार के इस कदम के पीछे की सबसे बड़ी वजह है भारत की तेजी से बढ़ती बिजली की जरूरत। देश में लगातार नए ट्रांसमिशन नेटवर्क बिछाए जा रहे हैं और रिन्यूएबल एनर्जी (सोलर और विंड पावर) को नेशनल ग्रिड से जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर पावर इक्विपमेंट की भारी मांग है।
सिर्फ ‘मेक इन इंडिया’ वाली कंपनियों को ही छूट
यह राहत सभी चीनी कंपनियों के लिए नहीं है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल उन कंपनियों को दी गई है जिनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स भारत में मौजूद हैं और जो पहले से भारतीय बिजली क्षेत्र में सक्रिय हैं। यानी, इन कंपनियों के इक्विपमेंट्स का निर्माण भारत में ही होता है। बिजली मंत्रालय ने जनवरी 2026 में ही वित्त मंत्रालय से इन कंपनियों के लिए रियायत का अनुरोध किया था, क्योंकि इनके पास देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता मौजूद है।
क्या सुरक्षा से समझौता हुआ है?
सरकार ने साफ कर दिया है कि यह फैसला चीन पर लगाई गई सभी पाबंदियों को हटाने जैसा नहीं है। यह छूट सिर्फ इन चार कंपनियों के लिए है और वह भी केवल अगले 2 साल के लिए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसे भविष्य के लिए कोई मिसाल (Precedent) नहीं माना जाएगा। गलवान के बाद से जो सुरक्षा नियम लागू किए गए थे, वे अभी भी अपनी जगह बरकरार हैं।
विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन
भारत इस समय अपने एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को दुनिया का सबसे मजबूत नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में देश को हजारों किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनें और आधुनिक सबस्टेशन बनाने हैं। ऐसे में सरकार ने अपनी सुरक्षा चिंताओं और विकास की जरूरतों के बीच एक ‘मिडल पाथ’ चुना है। अब देखना यह होगा कि ये चार कंपनियां अगले दो सालों में भारत के पावर सेक्टर को किस हद तक रफ्तार दे पाती हैं। यह फैसला साफ दिखाता है कि भारत अब ऊर्जा क्षेत्र में अपनी विकास की गति को और तेज करने के लिए तैयार है।
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