पेट्रोल-डीजल के ग्राहकों के लिए बड़ी खुशखबरी! अब नहीं होगी ईंधन की किल्लत, सरकार ने हटा ली ये पाबंदियां

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देश के उन तमाम कमर्शियल ग्राहकों के लिए बड़ी राहत की खबर है, जो पिछले कुछ समय से पेट्रोल-डीजल की खरीद को लेकर जूझ रहे थे। सरकार ने 1 जुलाई से पेट्रोल और डीजल की रिटेल बिक्री पर लगी तमाम पाबंदियों को हटाने का ऐलान कर दिया है। याद दिला दें कि ये पाबंदियां मिडिल ईस्ट में मचे संघर्ष और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में आई अस्थिरता के कारण घरेलू फ्यूल सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए एक इमरजेंसी उपाय के तौर पर लागू की गई थीं।

अब इस फैसले का सीधा और सरल मतलब यह है कि 1 जुलाई से बस, ट्रक और अन्य कमर्शियल वाहनों के मालिक बेझिझक पेट्रोल पंपों से सीधे खुदरा दरों पर ईंधन खरीद सकेंगे। इससे उनकी ईंधन लागत में कमी आएगी और कामकाज में आ रही रुकावटें दूर होंगी।

क्यों लगाई गई थी ये पाबंदियां?

सरकार ने जब ये नियम लागू किए थे, तब कमर्शियल यूजर्स को रिटेल आउटलेट्स (पेट्रोल पंप) से तेल खरीदने पर रोक लगा दी गई थी या फिर सीमा तय कर दी गई थी। नियम के तहत डीजल की बिक्री को प्रति ग्राहक या प्रति गाड़ी के लिए 200 लीटर प्रतिदिन तक सीमित कर दिया गया था। इसके पीछे की मुख्य वजह उस समय इलाके में तनाव के कारण सप्लाई चेन पर मंडरा रहा खतरा था, जिससे स्थानीय स्तर पर फ्यूल की कमी होने की आशंका बढ़ गई थी।

जून के महीने में लागू की गई इन पाबंदियों का एकमात्र उद्देश्य पेट्रोल और डीजल की देश भर में समान उपलब्धता बनाए रखना, जमाखोरी को रोकना और गलत तरीके से फ्यूल के इस्तेमाल पर लगाम लगाना था।

अब सामान्य हुए हालात, मिली बड़ी राहत

जियोपॉलिटिकल तनाव कम होने और हालात के सामान्य होने के बाद सरकार ने इन पाबंदियों को हटाने का निर्णय लिया है। अब ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स और इंडस्ट्रियल यूजर्स फिर से पहले की तरह बिना किसी मात्रा की सीमा के पेट्रोल पंपों से तेल खरीद सकेंगे।

दरअसल, जून में सरकार ने यह आदेश इसलिए दिया था क्योंकि रिटेल फ्यूल और बल्क सप्लाई की कीमतों में भारी अंतर आ गया था। उस समय इंडस्ट्रियल यूजर्स को रिटेल कीमतों की तुलना में करीब 40 रुपये प्रति लीटर तक ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे थे। इस ‘आर्बिट्रेज’ (कीमतों के अंतर) के कारण तमाम कमर्शियल कंपनियां सरकारी तेल कंपनियों के रिटेल आउटलेट्स पर टूट पड़ी थीं, क्योंकि वहां तेल काफी सस्ता था। इसी दबाव के कारण देश के कई हिस्सों में फ्यूल स्टेशनों पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया था।

सरकारी कंपनियों पर बढ़ा था बोझ

इन पाबंदियों के लागू होने से सरकारी रिटेलर कंपनियों यानी इंडियन ऑयल कॉर्प, भारत पेट्रोलियम कॉर्प और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प पर भारी दबाव देखा गया। भारत के 1,00,000 से ज्यादा फ्यूल स्टेशनों में से 90% का संचालन यही कंपनियां करती हैं। प्राइवेट रिटेलर्स, जो बाजार दरों के आसपास ईंधन बेच रहे थे, उनकी डीजल बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि सरकारी आउटलेट्स पर लंबी कतारें देखी गईं।

भारत, जो कि रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक बड़ा निर्यातक है, उसने ये कदम सिर्फ इसलिए उठाए थे ताकि देश में ईंधन की सप्लाई बिना किसी रुकावट के जारी रहे। अब सरकार का मानना है कि घरेलू सप्लाई पूरी तरह से सामान्य हो चुकी है, इसलिए इन इमरजेंसी पाबंदियों की अब और आवश्यकता नहीं है।