बैंकों की नकदी पर कसा शिकंजा! 12 साल बाद दोहराया गया वह सख्त कदम, 25 हजार करोड़ की भी है तैयारी

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बैंकों के पास जमा अतिरिक्त पैसे को लेकर केंद्रीय बैंक ने इस हफ्ते दूसरा बड़ा संदेश दे दिया है। rbi crr rule 99 percent bond sale से जुड़े ताजा फैसले के मुताबिक अब बैंकों को हर दिन अपने निर्धारित नकद आरक्षित अनुपात का कम से कम 99 फीसदी हिस्सा रिजर्व के रूप में रखना होगा। अभी तक यह न्यूनतम दैनिक सीमा 90 फीसदी थी। इसके साथ ही 13 अक्टूबर को 25 हजार करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग तंत्र से नकदी निकाली जाएगी, इनकी परिपक्वता अवधि 2030 से 2034 के बीच रखी गई है।

समझना जरूरी है कि यह कदम उसी हफ्ते आया है, जिसमें ढाई साल में पहली बार रेपो रेट बढ़ाकर 5.50 फीसदी किया गया है। यानी नीतिगत दर बढ़ाने के बाद अब केंद्रीय बैंक यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि बाजार की असली दरें उसी के आसपास रहें, नीचे न रेंगें।

बैंकों के लिए बदला यह रोज वाला नियम असल में है क्या

नकद आरक्षित अनुपात यानी वह रकम, जो हर बैंक को अपनी कुल जमा का तय हिस्सा केंद्रीय बैंक के पास नकद रखनी होती है। फिलहाल यह दर 3 फीसदी है और इस रकम पर बैंक को कोई ब्याज नहीं मिलता। नियम यह था कि पखवाड़े के औसत में 3 फीसदी बना रहना चाहिए और किसी भी दिन यह 90 फीसदी से नीचे नहीं जाना चाहिए। अब रोज की यह निचली सीमा 99 फीसदी हो गई है। मतलब बैंक अपनी नकदी को रोज की जरूरत के हिसाब से पहले जैसी आसानी से इधर-उधर नहीं कर पाएंगे। हालांकि बैंकरों का कहना है कि व्यवहार में असर सीमित रह सकता है, क्योंकि ज्यादातर बैंक पहले से ही तय सीमा का 95 फीसदी से ज्यादा हिस्सा रिजर्व में रखते हैं।

दूसरी तरफ बॉन्ड बिक्री का गणित सीधा है। सरकारी बॉन्ड की बिक्री होते ही बैंक व निवेशक उनकी खरीद में रकम लगाते हैं, जिससे तंत्र की नकदी सिकुड़ जाती है। सितंबर के महीने में भी तीन दौर में एक लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड बाजार में उतारे गए थे, जिनमें 17 सितंबर को 50 हजार करोड़ और 21 व 28 सितंबर को 25-25 हजार करोड़ की बिक्री शामिल थी।

3.88 लाख करोड़ की अतिरिक्त नकदी क्यों बन गई है चिंता

ताजा आंकड़ों के मुताबिक 8 अक्टूबर तक बैंकिंग तंत्र में करीब 3.88 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी मौजूद थी। इसका संकेत इससे मिलता है कि बैंक बड़ी मात्रा में पैसा केंद्रीय सुविधा के तहत जमा कर रहे थे। नकदी की अधिकता का सीधा असर यह होता है कि अल्पकालिक कर्ज की दरें नीतिगत दर के नीचे सरक जाती हैं। शुक्रवार को बैंकों के आपसी अल्पकालिक कर्ज की औसत दर 5.31 फीसदी रही, जबकि रेपो रेट 5.50 फीसदी है। गुरुवार को यह दर 5.30 फीसदी थी। केंद्रीय बैंक चाहता है कि यह दर रेपो रेट के करीब आए, ताकि दर बढ़ाने का असर असल बाजार तक पहुंचे।

ताजा नीलामियों में भी बैंकों की पसंद छोटी अवधि की ही रही, लंबी अवधि में पैसा फंसाने से वे बचते दिखे।

2013 में भी लागू हुआ था यही नियम, तब क्या हुआ था

इतिहास पर नजर डालें तो ऐसा सख्त नियम जुलाई 2013 में भी लागू किया गया था। उस दौर में अमेरिका के केंद्रीय बैंक की बॉन्ड खरीद घटाने के संकेतों से दुनिया भर के बाजारों में उथलपुथल मच गई थी, जिसे वित्तीय दुनिया में बड़े तूफान के नाम से याद किया जाता है। हालात संभलने पर सितंबर 2013 में सीमा घटाकर 95 फीसदी और अप्रैल 2016 में 90 फीसदी कर दी गई थी।

आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि बैंकिंग तंत्र की ढील खत्म होगी और अल्पकालिक दरें ऊपर की ओर दबाव में रहेंगी। कर्ज की दरों में तुरंत बड़ा बदलाव जरूरी नहीं, लेकिन सस्ते पैसे का दौर थमने का संकेत बिल्कुल साफ है। अब नजर इस पर रहेगी कि नकदी घटने के बाद बाजार की दरें वाकई रेपो रेट की लाइन में आती हैं या नहीं।

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