भाजपा की राजनीति- लग्न का समय तय दूल्हे एवं बारातियों का अता पता नहीं

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देहरादून

भारतीय जनता पार्टी में राजनीति की धुरी सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच में सिमटी हुई मानी जा रही है। 10 मार्च को परिणाम निकलने तथा प्रचंड बहुमत मिलने के बाद भी अभी पहाड़ का मुख्य सेवक का चेहरा कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा है। संवैधानिक बाध्यता यह है कि 23 मार्च से पहले पहले सरकार का गठन हो जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस सरकार के दूल्हे अथवा मुखिया का नाम ही भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तय नहीं कर पाया है। केंद्र की ओर से तय किए गए पर्यवेक्षक अभी तक देहरादून नहीं पहुंचे हैं ।

इसके बाद विधानमंडल दल की बैठक होनी है जिसमें केंद्रीय पर्यवेक्षक हाईकमान की ओर से भेजे गए नाम को उजागर करेंगे और विधानमंडल दल उसे हाईकमान के निर्देशानुसार सर्वसम्मति से अपना नेता मानेगा। केंद्रीय पर्यवेक्षक केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और दिल्ली के सांसद मीनाक्षी लेखी संभवत रविवार की शाम तक देहरादून पहुंचेंगे जिसके बाद सोमवार कि सुबह सभी विधायकों की बैठक होगी और विधानमंडल दल के नेता पर मोहर लगेगी लेकिन अभी तक भाजपा मंथन में जुटा हुआ है की आखिर किस नेता को राज्य में सत्ता की बागडोर सौंपी जाए भारतीय जनता पार्टी में 1 दर्जन से अधिक नाम उभर कर आए हैं लेकिन आलाकमान अब तक किसी पर सर्व अनुमति बनाने की स्थिति में नहीं आया है

विधायकों द्वारा लामबंदी से जिस तरह से पुष्कर सिंह धामी के लिए सीट छोड़ने की बात कही है उससे हाईकमान और अधिक मंथन में जुटा है ।पुष्कर सिंह धामी को अगर आलाकमान दोबारा से उत्तराखंड की गद्दी होता है तो निश्चित रूप से यह संदेश जाएगा की जिस नाम को लेकर पार्टी सत्ता में आई है वह स्वयं सत्ता से किस तरह से बेदखल हो गए कुछ वरिष्ठ विधायकों की नाराजगी भी उभर कर आ सकती है कि जिस नाम को जनता ने स्वीकार करने में कोई रुचि नहीं ली उस पर किस तरह से आलाकमान रुचि ले रहा है। इसी उधेड़बुन में लगातार नीता के चुनाव में देरी हो रही है।

केंद्र के सूत्रों के अनुसार केंद्रीय पर्यवेक्षक राजनाथ सिंह निश्चित रूप से पुष्कर सिंह धामी के नाम पर सहमत होंगे और वह विधायकों के मन को टटोल कर इस पर निर्णय लेंगे लेकिन क्या हाईकमान इस बात के लिए तैयार होगा की उन्हें दोबारा से सत्ता की बागडोर सौंप दी जाए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह निर्णय भाजपा के लिए इतना आसान नहीं है हालांकि पुष्कर सिंह धामी के द्वारा के कार्यकाल में जिस तरह से भाजपा के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को कम किया है और पार्टी स्पष्ट दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई है इस बात को नकारना भी बहुत आसान नहीं होगा

हालांकि बहुत से लोगों ने यह भी माना है कि नेतृत्व किसी गैर विधायक को दिया जा सकता है जिसके लिए अलार्म मंथन कर रहा है। माना यह जा रहा है की किसी सीनियर विधायक को सत्ता की बागडोर दी जाए ताकि किसी भी तरह का मनमुटाव विधायकों के मन में ना रहे लोकसभा चुनाव के लिए करीब 2 साल का वक्त बचा है ऐसे में किसी सांसद पर दांव लगाना भी ठीक नहीं समझा जा रहा है। आलाकमान इस कदम को फूक फूक कर उठाने को मजबूर हो रहा है इसीलिए इतना समय विधानमंडल दल के नेता को तय करने में लग रहा है एक दर्जन के करीब दावेदार हैं जिन को लेकर पार्टी मंथन कर रही है कुल मिलाकर यह कहा जाए कि संवैधानिक बाध्यता के चलते यहां पर 23 मार्च से पहले सरकार का गठन होना तय है लेकिन स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद भी अगर इसमें देरी हो रही है तो यह माना जाए कि भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व प्रदान करने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। या यूं कहा जाए कि बारात और दूल्हे के इंतजार में लग्न का समय निकलता जा रहा है। संवैधानिक दायित्व के तहत 23 मार्च से पहले किसी भी स्थिति में सरकार का गठन हो जाना चाहिए।

जिन प्रमुख नामों पर मंथन किया जा रहा है उनमें मुख्य रूप से विधायकों में सतपाल महाराज बंशीधर भगत प्रेमचंद अग्रवाल बिशन सिंह चुफाल रितु भूषण खंडूरी शामिल है वही राज्यसभा से सांसद अनिल बलूनी वह लोकसभा से सांसद रमेश पोखरियाल निशंक और रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इससे पूर्व बने दो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत विधायक नहीं होने की वजह से तथा चुनाव से पहले उन्हें अपदस्थ करने के कारण उनका नाम नहीं चल रहा है।

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